Sunday, July 22, 2007

इतिहास की परीक्षा

बचपन मेँ एक बाल-पत्रिका मेँ यह कविता पढ़ी थी। याद रह गयी। स्कूल मेँ और उसके बाद भी कई बार सुनायी।आज एक मित्र को बच्चोँ के लिए एक हास्य कविता की तलाश थी , सो ये कविता याद आ गयी। साथ ही यह एहसास भी हुआ कि बच्चोँ के लिए लिखी गयी हास्य कविताओँ की किस कदर कमी है।
शायद ये मेरी भूल हो, शायद सच मेँ ऐसा नहीँ है, इसी उम्मीद के साथ बच्चोँ को मेरी यादोँ के पिटारे से ये तोहफ़ा। और तहेदिल से शुक्रिया उन जनाब का, जिनकी ये कृति है।

इतिहास की परीक्षा

इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिन्ता से हृदय धड़कता था,
जागा था जबसे सुबह, तभी से बाँया नयन फड़कता था।


जो उत्तर मैंने याद किये, उनमें से आधे याद हुऐ,
वो भी स्कूल पँहुचने तक, यादों में ही बरबाद हुऐ।

जो सीट दिखाई दी खाली उस पर ही डट कर जा बैठा,
था एक निरीक्षक कमरे मेँ, वो आया झल्लाया और ऐँठा ।

'रे रे तेरा है ध्यान किधर, करके क्यूँ आया देरी है,
तू यहाँ कहाँ पर आ बैठा, उठ जा ये कुर्सी मेरी है ।'

मैँ उचका एक उच्चक्के सा, सीटोँ मेँ - मुझमेँ मैच हुआ,
चकरा टकरा कर कहीँ एक कुर्सी के द्वारा कैच हुआ।

जब पर्चे पर मेरी नज़र पड़ी, तो सारा बदन पसीना था,
फिर भी पर्चे से डरा नहीँ जो, ये मेरा ही सीना था।


कापी के बरगद पर मैंने, फिर कलम कुल्हाड़ा दे मारा,
घंटे भर के भीतर कर डाला सब प्रश्‍नों का वारा- न्यारा।

होटल का मालिक था अशोक जो ताजमहल में रहता था,
ओ अंग्रेज़ोँ भारत छोड़ो वो लाल किले से कहता था।

झाँसा दे जाती थी सबको ऐसी थी झाँसी की रानी,
अक्सर अशोक के होटल में खाया करती थी बिरयानी।

अकबर का बेटा था बाबर, जो वायुयान से आया था,
उसने ही हिन्द-महासागर अमरीका से मँगवाया था।


गौतम जो बुद्ध हुए जाकर, वो गाँधी जी के चेले थे,
बचपन मेँ वो नेहरू के संग गुल्ली-डंडा खेले थे।


ऐसे ही उत्तर चुन-चुन कर मैंने प्रश्‍नों के पापड़ बेल दिये,
उत्तर के ये ऊँचे पहाड़ टीचर की ओर धकेल दिये।

टीचर जी इस ऊँचाई तक बेचारे कैसे चढ़ पाते,
लाचार पुराने चश्‍में से, इतिहास नया क्या पढ़ पाते।

टीचर जी की समझ के बाहर, मेरे इतिहासोँ का भूगोल हुआ,
ऐसे मेँ फिर क्या होना था, मेरा तो नम्बर गोल हुआ।


नाद के लिए
अनुपम पचौरी

Sunday, March 18, 2007

अमरूद वाला बाग़ उर्फ़ भगवान की दुकान


तो जनाब नोट्पैड ने लिखा अक्षरधाम का किस्सा और आज शाम ही हमेँ दीख पड़ी - Divine shop। कहाँ? अजी ज़यपुर , विधानसभा के पास, अमरूद वाले बाग़ मेँ!


अब इसे इश्वरीय दुकानदारी कहेँ या भगवान की दुकानदारी , अर्थ लगभग एक ही है।
और भी बहुत कुछ बिक रहा था यहाँ। भुजिया, चाट, पाव भाजी.....शहद वगैरह...और जो पहले ही बिक चुके थे वो थे समारोह के रॉइट्स


मौका था....द आर्ट ऑफ लिविँग की रजत जयंती।

सफ़ेदपोश sri sri ravishankar (पता नहीँ ये जनाब दो बार श्री क्योँ हुए हैँ? किसी को मालूम हो तो हमेँ भी बतावे।) के लिये भव्य backdrop के सामने एक सिँहासन। और backdrop की खीर मेँ करेले का तड़्का लगाता हुआ समारोह का नीला-सफ़ेद logo
300 के करीब संगीतज्ञोँ का जमावड़ा। ईश्वर की प्रशंसा मेँ गीत, संगीत, भजन गाते हुए। साथ ही उदघोषकोँ द्वारा लोगोँ से जय गुरुदेव का नारा उठाने का आग्रह।
शहर के कई दिग्गज समारोह की सफलता का बीड़ा उठाए! भव्यता का मायजाल ऐसा की बड़े-बड़े रजवाड़े भी पानी भरेँ। हर उपस्थित जन को उसकी लघुता का बोध कराती। एक विशाल प्रवाह मेँ बहने को आतुर जन-समूह।
कुछ और भी है इस mass opium के अलावा, जो इतने विशाल जन समूह को एक साथ ले आये। World Cup! किसी ने कहा।
एक विश्व बाज़ार से जुड़्ता धर्म... दुनिया भर मेँ (कई हिस्सोँ मेँ) इस आयोजन का प्रसारण हो रहा है। किसी ने इशारा किया कि कम से कम 15 लाख का मुनाफ़ा हुआ होगा तो दूसरे ने उसे टोक दिया। क्या बात करते हो जनाब! करोड़ोँ की गिनती भूल गये क्या? ना जाने कितने transmission rights बिके होंगे इस event के।
सही आँकड़े चाहे जो भी होँ, तसल्ली हुई कि यहाँ उपस्थित सभी शायद नशे मेँ नहीँ।
लेकिन भगवान के नाम पर एक stressed समाज कब तक दम मारो दम गाता रहेगा ? और उसे destress करने वाले कला या ईश्वर के नाम पर दुकानदारी करते रहेँगे......

anupam pachauri

Sunday, March 11, 2007

नारद मुनी की नज़र

भई नाद के साथी चाहते हैँ कि नारद पर नादकारी को पंजीकृत करवा लेवेँ। बातचीत कुछ हुई नहीँ कि पंजीकरण एक ज़रूरत लगने लगी। अभी हिन्दी को न जाने कितनी कॉलोनियाँ और झेलनी पड़ेँगी। लगभग 250 साल हुए हैँ अभी तो। ये Netizen बनने के लिए ज़रूरी है शायद।

वैसे हमने नारद के बारे मेँ पढ़ा भी। पता चला कि मुनिवर ब्लॉग्जगत पर नज़र रखते हैँ.... तो लगा कि अभी शायद वक़्त नहीँ आया या यूँ कहेँ कि अभी नज़रबन्द होने का वक़्त नहीँ है नादकारी मेँ।

अनुपम पचौरी
anupam pachauri

हरियाए पात्

ज़माना हुआ ब्लॉग पर कुछ उकेरा नहीँ। नाद्कारी का वक़्त फिर आ गया है। एक नये किस्म का ब्लॉग शुरु करने की मंशा कई दिनोँ से मन मेँ पनप रही है। इसी बीच नाद के कई साथियोँ ने याद दिलाया कि भैया नया तो ठीक है लेकिन जो कुछ साल पहले भुला बैठे हो उस पर भी कुछ तवज्जो दो। सो हम हाजिर हो गये हैं।

और इस दौरान न जाने कितना पानी जमुना से गायब हो गया है।


अनुपम पचौरी
anupam pachauri

Monday, September 06, 2004

नाद बनाम नाद्कारी

नाद के बारे मेँ .......

ना शोर शराबा ..... ना उद्घोषणा....

कुछ स्वर उनके जो कहते हैं बात करते हैं कि बदलाव के रास्ते खुलेँ....