तो जनाब नोट्पैड ने लिखा अक्षरधाम का किस्सा और आज शाम ही हमेँ दीख पड़ी - Divine shop। कहाँ? अजी ज़यपुर , विधानसभा के पास, अमरूद वाले बाग़ मेँ!
अब इसे इश्वरीय दुकानदारी कहेँ या भगवान की दुकानदारी , अर्थ लगभग एक ही है।
अब इसे इश्वरीय दुकानदारी कहेँ या भगवान की दुकानदारी , अर्थ लगभग एक ही है।
और भी बहुत कुछ बिक रहा था यहाँ। भुजिया, चाट, पाव भाजी.....शहद वगैरह...और
जो पहले ही बिक चुके थे वो थे समारोह के रॉइट्स
मौका था....द आर्ट ऑफ लिविँग की रजत जयंती।
सफ़ेदपोश sri sri ravishankar (पता नहीँ ये जनाब दो बार श्री क्योँ हुए हैँ? किसी को मालूम हो तो हमेँ भी बतावे।) के लिये भव्य backdrop के सामने एक सिँहासन। और backdrop की खीर मेँ करेले का तड़्का लगाता हुआ समारोह का नीला-सफ़ेद logo
300 के करीब संगीतज्ञोँ का जमावड़ा। ईश्वर की प्रशंसा मेँ गीत, संगीत, भजन गाते हुए। साथ ही उदघोषकोँ द्वारा लोगोँ से जय गुरुदेव का नारा उठाने का आग्रह।
शहर के कई दिग्गज समारोह की सफलता का बीड़ा उठाए! भव्यता का मायजाल
ऐसा की बड़े-बड़े रजवाड़े भी पानी भरेँ। हर उपस्थित जन को उसकी लघुता का बोध कराती। एक विशाल प्रवाह मेँ बहने को आतुर जन-समूह।
कुछ और भी है इस mass opium के अलावा, जो इतने विशाल जन समूह को एक साथ ले आये। World Cup! किसी ने कहा। 
एक विश्व बाज़ार से जुड़्ता धर्म... दुनिया भर मेँ (कई हिस्सोँ मेँ) इस आयोजन का प्रसारण हो रहा है। किसी ने इशारा किया कि कम से कम 15 लाख का मुनाफ़ा हुआ होगा तो दूसरे ने उसे टोक दिया। क्या बात करते हो जनाब! करोड़ोँ की गिनती भूल गये क्या? ना जाने कितने transmission rights बिके होंगे इस event के।
एक विश्व बाज़ार से जुड़्ता धर्म... दुनिया भर मेँ (कई हिस्सोँ मेँ) इस आयोजन का प्रसारण हो रहा है। किसी ने इशारा किया कि कम से कम 15 लाख का मुनाफ़ा हुआ होगा तो दूसरे ने उसे टोक दिया। क्या बात करते हो जनाब! करोड़ोँ की गिनती भूल गये क्या? ना जाने कितने transmission rights बिके होंगे इस event के।
सही आँकड़े चाहे जो भी होँ, तसल्ली हुई कि यहाँ उपस्थित सभी शायद नशे मेँ नहीँ।
लेकिन भगवान के नाम पर एक stressed समाज कब तक दम मारो दम गाता रहेगा ? और उसे destress करने वाले कला या ईश्वर के नाम पर दुकानदारी करते रहेँगे......
anupam pachauri
6 comments:
सही कहा।
पर शायद भगवान तो हमेशा ही अपने अपने समय के बाजार की निर्मिति ही होता है।
जो भी हो आलोचनात्मक नजर जरूरी है।
बहुत अच्छे। इस तरह की नज़र होना बहुत आश्वस्त करता है। व्यापारी के बनाए भग्वान से तो भगवान ही बचाए१
Are Bahut Dinn huye.... koi naya laik nahin likhaa gaya.. ham besabri se intezaar kar rahey hain aap kaa.
Shubhaa-kaankshi
We are waiting for your next laikh.
Hi anupam.....bahut din hue...jab maine ...apne comments is lekh ke bare me aap ke saath bantne ko kaha tha...
tasvire lekh ke text ko aur sanwarti hain , aur jo seedhi baat hain shayad voh jaroori thi is ko ek aur nazariya dene ke liye...aur humare ko janne ke liye ....
aapne bahut dino se nahi likha...?
श्वेता!
अपना वादा निभाने के लिये शुक्रिया...
बात आगे बढ़ाने के लिये ज़रूरी है कि पढ़ने वाले भी अपनी बात सामने रखेँ!
आजकल कुछ अलग किस्म का लिखा जा रहा है...निरि ब्लौगिँग http://life-expressions.blogspot.com/... अब इसे लिखना नहीँ कह सकती...
लेकिन एक ठिकाना है जो शायद तुम्हेँ भी पसन्द आये http://sandoftheeye.blogspot.com/
इसे पढ़् कर अपनी राय ज़रूर देना...
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