भई नाद के साथी चाहते हैँ कि नारद पर नादकारी को पंजीकृत करवा लेवेँ। बातचीत कुछ हुई नहीँ कि पंजीकरण एक ज़रूरत लगने लगी। अभी हिन्दी को न जाने कितनी कॉलोनियाँ और झेलनी पड़ेँगी। लगभग 250 साल हुए हैँ अभी तो। ये Netizen बनने के लिए ज़रूरी है शायद।
वैसे हमने नारद के बारे मेँ पढ़ा भी। पता चला कि मुनिवर ब्लॉग्जगत पर नज़र रखते हैँ.... तो लगा कि अभी शायद वक़्त नहीँ आया या यूँ कहेँ कि अभी नज़रबन्द होने का वक़्त नहीँ है नादकारी मेँ।
अनुपम पचौरी
anupam pachauri
Sunday, March 11, 2007
हरियाए पात्
ज़माना हुआ ब्लॉग पर कुछ उकेरा नहीँ। नाद्कारी का वक़्त फिर आ गया है। एक नये किस्म का ब्लॉग शुरु करने की मंशा कई दिनोँ से मन मेँ पनप रही है। इसी बीच नाद के कई साथियोँ ने याद दिलाया कि भैया नया तो ठीक है लेकिन जो कुछ साल पहले भुला बैठे हो उस पर भी कुछ तवज्जो दो। सो हम हाजिर हो गये हैं।
और इस दौरान न जाने कितना पानी जमुना से गायब हो गया है।
अनुपम पचौरी
anupam pachauri
और इस दौरान न जाने कितना पानी जमुना से गायब हो गया है।
अनुपम पचौरी
anupam pachauri
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